Tuesday, November 6, 2007

हिंदी चिट्ठाकारी पर छपा एक ऊल जलूल लेख

आज के नवभारत टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर किन्हीं अनुराधा और दिलीप मंडल का हिंदी चिट्ठाकारी पर एक अजीब सा लेख छपा है। गोल मोल भाषा में लिखे इस लेख में अधिकतर एक दूसरे से विरोधाभासी बातें लिखीं गयी हैं।

लेख का शीर्षक ही है "ब्लॉग है, कोई करिश्मा नहीं"

कुछ उदाहरण देखिये:

"नए शब्दों को छोड़ भी दें, तो पुराने शब्दों को लिखने के अलग-अलग शब्दकोषों में अलग-अलग तरीके बताए गए हैं। कागज की तरह कंप्यूटर पर भी हर यूजर का अपना शब्दकोष है, अपने फॉन्ट और ब्राउजर हैं। इस विसंगति की वजह से हिंदी में अंगेजी की तरह ताकतवर स्पेल चेक जैसा सॉफ्टवेयर नहीं आ पाया है।"

"इंटरनेट से जुड़ने के लिए या तो आपके पास बीस से पच्चीस हजार का कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन होना चाहिए या फि र पास-पड़ोस में इंटरनेट कैफे हो, जहां आप हर घंटे के कुछ रुपये देकर ऑनलाइन हो सकें।"

"एक माध्यम के रूप में ब्लॉग की ताकत की अनदेखी नहीं की जा सकती। कई तरह के असंतोष और हाशिए के लोगों की आवाज दूसरे माध्यमों की तुलना में ब्लॉग पर आसानी से पहुंच सकती है। मिसाल के तौर पर कमजोर समूह, जिनके हाथ में अखबार या चैनल नहीं हैं और जहां उनकी आवाज अनसुनी रह जाती है, ब्लॉग का संवाद के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।


दरअसल बहस इस बात की नहीं है कि एक माध्यम के तौर पर ब्लॉग का इस्तेमाल किया जाए या नहीं। समस्या तब होती है जब कुछ लोग इसके असर को लेकर चमत्कृत हो जाते हैं और दूसरों को भी चमत्कृत करने की कोशिश करते हैं। ब्लॉग से किसी चमत्कारिक नतीजों की उम्मीद करना मौजूदा स्थितियों में निरर्थक है।"

"अभी ब्लॉग का असर कम है, इसलिए सरकार भी वहां छपनेवाली चीजों को लेकर गंभीर नहीं है। वरना अब तक सरकार ऐसी कानूनी शक्तियों से खुद को लैस कर चुकी है जिसके बूते वह इंटरनेट की पहरेदारी कर सकती है। खासकर भारत के आईपी एड्रेस से इंटरनेट पर डाली गई सामग्री कानून के दायरे में है।"

पूरा लेख यहां है।

और भी हैं मजेदार समाचार

ताजा समाचार